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सोचतीं हूँ


सोचतीं हूँ
बहुत सोचतीं हूँ


अब नहीं सोचतीं
क्यों सोचती रहूँ


जो मेरे बारे मे नहीं सोचता
क्या मैं पागल हूँ कि
बस तुम्हें ही सोचती रहूँ


कितने मुद्दे हैं सोचने के लिए
देश
समाज
विज्ञान
मनोविज्ञान
अर्थशास्त्र
धर्म
दर्शन
प्राकृतिक
चिकित्सा


इतने विषय है
तुम्हें न सोचने के लिए


जब देश के लिए सोचती हूँ
तो सोचती हूँ कि तुम्हारे जैसे कर्मठ
देश का हर नागरिक हो
तो भारत सर्वश्रेष्ठ होगा विश्व में


जब समाज के लिए सोचती हूँ
तो सोचती हूँ कि तुम्हारे जैसे आदर्शवादी पुरूष हो
तो समाज की समस्त विकृतियां स्वतः ही समाप्त हो जाएं


जब सोचती हूँ विज्ञान के लिए
तुम सूर्य समान लगते हो
जो अपनी स्वर्णिम रश्मि से कण कण मे
ऊर्जा और जान भर दें


जब सोचती हूँ अर्थशास्त्र पर
क्या लाभप्रद है कि मैं अपना समय यूँ व्यर्थ करूँ
पर तुम भी तो अपना मूल्यवान समय
यूं ही मुझ पागल पर व्यर्थ करते हो


जब सोचती हूँ प्राकृतिक के बारे में
तब तुम्हारे मूड की तरह मौसम बदलते रहते हैं
साथ साथ मेरा भी


जब मैं सोचती हूँ मनोविज्ञान पर
तब समझ आता है कि जब एक औरत आदमी से
सच्चा प्रेम करती हैं तो
सारे रिश्ते सारी दुनिया बस वहीं हो जाता है


जब सोचती हूँ धर्म के बारे में
तुम मुझे अपने पुण्यों के प्रतिफल दिखते हो


अब तुम हीं बताओं

मैं सोच सोच कर भी बस तुम्हें ही सोच पाती हूँ
चाहे रास्ते हो कोई मंजिल तुम तक पहुंच जाती हैं


मेरी हर सोच ग्रहों की तरह
मेरे सूर्य की परिक्रमा करती हैं
मेरे पल पल के साथी



Source: अर्पणा संत सिंह Facebook Post
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